माँ की दिनचर्या🙏🙏 मेरी माँ अलसुबह ठीक चार बजे उठ जातीं थीं | नित्य क्रिया के बाद "भये प्रगट कृपाला दीन दयाला, कौशल्या हितकारी... " भजन गाकर हमलोग को उठाया करतीं थीं | आज भी जब ये भजन पढती या सुनती हूँ तो अपने बचपन के दिनों में खो जाती हूँ | उसके बाद माँ हमलोग को पढ़ने के लिए बैठा देतीं थीं और स्वयं गृह कार्य में जुट जातीं थीं क्योंकि उन्हें विद्यालय जाना होता था |प्रधानाध्यापिका होने के नाते विद्यालय में भी काफी जिम्मेवारी थीं माँ की और वो अपने हर कार्य को अनुशासन के साथ करतीं थीं | इसीलिए हमलोगों को भी अनुशासित जीवन जीने की प्रेरणा हमेशा देतीं रहीं | मितव्ययी थीं लेकिन कंजुस नहीं इसलिए कभी आर्थिक मुसीबत नही आई |जीवन का जो भी पाठ रहा हो दूसरों को पढाने से पहले स्वयं उस को अपने उपर लागू करतीं थीं |विद्यालय से आने के बाद घर🏡 में छूटे हुए कार्यो को पुरा करतीं थीं |माँ का प्रयास रहता था कि भोजन स्वयं बनाए. सच में माँ के हाथों बने भोजन का स्वाद तो अविस्मरणीय है |आठ से नौ बजे तक रात्रि विश्राम करने को मजबूर हो जाती थीं क्योंकि सुबह उठने के बाद कभी भी एक मिनट का फुर्सत नहीं मिलता था माँ को |हर समय काम में व्यस्त रहने के कारण इतना थक जाती थीं कि कहीं भी कैसे भी नींद आ जाती माँ को... 🙏🙏🙏

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