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समझ जिंदगी की

जिंदगी के आपाधापी के साथ हम कब इतने बड़े हो गए कि  विचारों में व्यवहार में परिपक्वता आ गई. नादानियां अपना पल्ला छुड़ाकर कबका मैदान छोड़ गईं. जिंदगी के समर में सबके अपने चुनौती होती है परन्तु जबतक आप किसी बड़ी चुनौती को नजदीक से नहीं देखते तबतक आप को अपना संघर्ष पहाड़ सरीखा महसूस होता है इसलिए आवश्यक है कि आप अपनी दूनिया से बाहर निकले और  देखें महसूस करें  कि संसार में सच्चाई कल्पना से परे है संघर्ष इतना ज्यादा है कि मानवता  दांव पर लगी हुई है  जिसके पास खाने को है उसे भुख नहीं और जो भूखा है उसके पास खाना नहीं.  किस अंधी दौड़ में मानव शामिल हो गया है उसने मानवता को ही दांव पर लगा दिया....  क्या ठहरकर सोचने का वक्त नहीं आ गया है  या फिर इतनी भी सोचने की शक्ति नहीं बची है. मानव समुदाय निरर्थक एक दूसरे के को खत्म करने में लगा है जबकि वह भी इस संसार का अस्थायी मेहमान ही है  .  किस तरह के संसार में जी रहे हैं लोग जहाँ बच्चों को भी नहीं बख्श रहे हैं  . और कितना नीचे गिरेगा इंसान  क्यों नहीं इस तरह के नीच प्राणियों को भगवान सबक सिखाते ...