भारतीय🇮🇳👳 संस्कृति

भारतीय संस्कृति में हर मौसम🌍☀⛅☁💧⚡❄ को अलग एवं महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है |जैसे अभी बरसात  के मौसम को भारत में एक उत्सव की तरह मनाने की परंपरा है |भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है जिसमें कृषिकार्यो को भी आनंदमय तरीके से संपन्न किये जाने की परंपरा थी   बरसात के मौसम में  धान रोपण का प्रमुख कार्य होता है | और भी रबी फसल रोपे जाते हैं लेकिन व्यापक क्षेत्र में धान की फसल ही लगायी जाती है| मुझे याद है आज से तीस पैंतीस वर्ष पूर्व में धान की पहली रोपण के अवसर पर जिसे  बिहार में पहरोपा कहा जाता है केे अवसर पर विशेष रूप से खाना बनाने और   खिलाने की परंंपरा थी  पता नहीं अब लोग इसे कैसे मनाते हैं  |बरसात के मौसम में एक और प्रचलन बिहार में है चना का दाल भरकर पूड़ी जिसे दलपुडी कहा  जााता हैऔर खीर पकाकर खाते हैं  इसे अदरिया कहते हैं क्योंकि आद्रा नक्षत्र में विशेष रूप से इस प्रकार के भोजन बनाने और खिलाने की परंपरा है|  बरसात के मौसम में पकौड़े के साथ चाय का अलग ही मजा है | सावन का महीना भगवान शिव जी का  महीना है हर साल काांवरियो से  गुलज़ार रहने वाले शिव की नगरी इस बार मायूस है | खैैर

कोरोना  जो दिन न दिखाए  | अब तो भगवान शिव जी से  यही  प्राथॆना है की जलदी  सै सबकुछ ठीक हो जाए .

बरसात कें  मौसम मे नागो के पूजे जाने की परंपरा भी भारत मे है नागपंचमी के दिन  नाग देवता काे लावा और दूध चढ़ाया जाता   है  .यह प्रकृति के प्रति आभार प्रकट  करने का तरीका है  .भारतीय संस्कृति में प्राचीनकाल से ही  प्रकृति को  संरक्षित रखने  के लिए दैनिक जीवन में ही ऐसे आचरण शामिल किए गये जिससें प्रकृति स्वतःही पल्लवित्त  और  पुष्पित होते  रहे  .हमारे पू्वजो  को यह अच्छे से पता था  कि प्रकृति का अत्यधिक दोहण कितना घातक हो सकता है  जबकि आधुनिकता का दंभ भरने वाले  वर्त्तमान मानव समूदाय इसके प्रति लापरवाही बरतने की  आदत से  मजबूर है  .जबतक मानव प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेवारी नहीं समझेगा तबतक प्रकृति का सरंक्षण संभव  नहीं है .भारतीय संस्कृति में प्रकृति🌿🍃 के प्रति संवेदनशीलता सहज भाव में परिलक्षित होती है  . हरेक जीव जन्तु के प्रति दया भाव एवं पेड़ पौधों के प्रति लगाव हमारे दैनिक जीवन में शामिल रहे हैं | हमारे पूर्वजों को शायद इस बात का अंदेशा रहा होगा कि आने वाली पीढ़ी प्रकृति को सहेजने में सफल नहीं रहेगी इसलिए प्रकृति के प्रति पूजा पाठ का भाव रखने की परंपरा का विकास किया ताकि हम सहजता से अपने आस पास के वातावरण एवं प्रकृति🌿🍃 को संरक्षित रख  सकने में सफल रहें |

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