लुप्तप्राय प्रथाएं

 हमलोग अपने जीवन में अपने समाज में कितने ही प्रथाएं खोते जा रहे हैं इसका अंदाजा भी नहीं है  . कहीं ऐसा न हो कि आने वाली पीढ़ी को बहुत समझाने के बाद भी हमलोग  उनलोगों को अपने भूले बिसरे चीजों से अवगत कराने में असमर्थ हो जाए  

यह एक प्रकार का वैसा ही संकटग्रस्त सामाजिक कल है जैसे संकटग्रस्त वन्य जीव प्राणी आज है. ये आज की पीढ़ी की सामाजिक जिम्मेदारी बनती है कि वो अपनी प्रथाओं को सहेजकर रखे और उसे आने वाली पीढ़ी को वैसे ही  सौंपें जैसा उन्हें विरासत में मिली.

ऐसी ही एक संकटग्रस्त प्रथा है सामूहिक भोज में परोसकर खिलाने की परंपरा. 

आजकल किसी भी प्रकार के आयोजन हो खाना परोसकर खिलाने के बजाय स्वयं सेवा आधारित हो गया है. मेजबान द्वारा खाने का मनुहार नहीं पूछा जाता है कि खाना खाया कि नहीं मेहमान लोग भी खाने पर ऐसे टुट पड़ते हैं  जैसे खाना मिलेगा ही नहीं .

दिखावे के चक्कर में छप्पन प्रकार के व्यंजन की व्यवस्था की जाती है लेकिन भोजन में न तो स्वाद रहता है और न ही जूठे का ख्याल रखा जाता है लोग खाना खाते रहते हैं और उसी जूठे हाथ से दोबारा खाना लेने स्टाल पर पहुँच जाते हैं  . इस प्रकार जूठा भोजन ही लोग खाते हैं हालांकि कहीं कहीं स्टालों पर वेटर भी खड़े रहते हैं पर वे सिर्फ निगरानी ही करते रहते हैं कि कहीं खाना कम न हो.



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