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लुप्तप्राय प्रथाएं

 हमलोग अपने जीवन में अपने समाज में कितने ही प्रथाएं खोते जा रहे हैं इसका अंदाजा भी नहीं है  . कहीं ऐसा न हो कि आने वाली पीढ़ी को बहुत समझाने के बाद भी हमलोग  उनलोगों को अपने भूले बिसरे चीजों से अवगत कराने में असमर्थ हो जाए   यह एक प्रकार का वैसा ही संकटग्रस्त सामाजिक कल है जैसे संकटग्रस्त वन्य जीव प्राणी आज है. ये आज की पीढ़ी की सामाजिक जिम्मेदारी बनती है कि वो अपनी प्रथाओं को सहेजकर रखे और उसे आने वाली पीढ़ी को वैसे ही  सौंपें जैसा उन्हें विरासत में मिली. ऐसी ही एक संकटग्रस्त प्रथा है सामूहिक भोज में परोसकर खिलाने की परंपरा.  आजकल किसी भी प्रकार के आयोजन हो खाना परोसकर खिलाने के बजाय स्वयं सेवा आधारित हो गया है. मेजबान द्वारा खाने का मनुहार नहीं पूछा जाता है कि खाना खाया कि नहीं मेहमान लोग भी खाने पर ऐसे टुट पड़ते हैं  जैसे खाना मिलेगा ही नहीं . दिखावे के चक्कर में छप्पन प्रकार के व्यंजन की व्यवस्था की जाती है लेकिन भोजन में न तो स्वाद रहता है और न ही जूठे का ख्याल रखा जाता है लोग खाना खाते रहते हैं और उसी जूठे हाथ से दोबारा खाना लेने स्टाल पर पह...

समझ जिंदगी की

जिंदगी के आपाधापी के साथ हम कब इतने बड़े हो गए कि  विचारों में व्यवहार में परिपक्वता आ गई. नादानियां अपना पल्ला छुड़ाकर कबका मैदान छोड़ गईं. जिंदगी के समर में सबके अपने चुनौती होती है परन्तु जबतक आप किसी बड़ी चुनौती को नजदीक से नहीं देखते तबतक आप को अपना संघर्ष पहाड़ सरीखा महसूस होता है इसलिए आवश्यक है कि आप अपनी दूनिया से बाहर निकले और  देखें महसूस करें  कि संसार में सच्चाई कल्पना से परे है संघर्ष इतना ज्यादा है कि मानवता  दांव पर लगी हुई है  जिसके पास खाने को है उसे भुख नहीं और जो भूखा है उसके पास खाना नहीं.  किस अंधी दौड़ में मानव शामिल हो गया है उसने मानवता को ही दांव पर लगा दिया....  क्या ठहरकर सोचने का वक्त नहीं आ गया है  या फिर इतनी भी सोचने की शक्ति नहीं बची है. मानव समुदाय निरर्थक एक दूसरे के को खत्म करने में लगा है जबकि वह भी इस संसार का अस्थायी मेहमान ही है  .  किस तरह के संसार में जी रहे हैं लोग जहाँ बच्चों को भी नहीं बख्श रहे हैं  . और कितना नीचे गिरेगा इंसान  क्यों नहीं इस तरह के नीच प्राणियों को भगवान सबक सिखाते ...

रक्षाबन्धन त्योहार 2020

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रक्षाबन्धन का त्यौहार 2020 भारत त्यौहारों का देश है |भारतीय संस्कृति में सात वार  नौ त्योहार वाली कहावत चरितार्थ होती है यानि सात दिन के सप्ताह में नौ त्योहार मनाने की परंपरा चली आ रही है  |श्रावण पूर्णिमा के दिन भारतीय संस्कृति में रक्षाबन्धन  के रूप मेंेे मनाने की परंपरा है | इस बार अन्य त्योहार की तरह रक्षाबन्धन त्योहार पर भी कोरोना  का ग्रहण  लगा रहेगा | परंतु हमलोगो को सावधानी बरतते हुए अपने परंपरा को निभाने का सार्थक प्रयास करना चाहिए | रक्षाबन्धन 2020 का शुभ मुहूर्त  -3 अगस्त  दिन सोमवार को पूर्वान्ह  9:14  बजे से रात्रि 9:17  बजे तक | रक्षाबन्धन  का त्यौहार मनाने के पीछे कुछ पौराणिक कथाओं का महत्वपूर्ण स्थान है .कहा जाता  हैं कि  एक बार     श्री कृष्ण  भगवान की कलाई पर  चोट लग गई थी तब  द्ौपदी ने साङी  का आंचल फाङकर  कलाई पर बांध दी  श्रीकृष्ण भगवान ने  मुस्कुराते हुए जीवन भर रक्षा करने का वादा किया  जिसें उन्होने निभाया भी . रक्षाबंधन  का त्यौ...

भारतीय🇮🇳👳 संस्कृति

भारतीय संस्कृति में हर मौसम🌍☀⛅☁💧⚡❄ को अलग एवं महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है |जैसे अभी बरसात  के मौसम को भारत में एक उत्सव की तरह मनाने की परंपरा है |भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है जिसमें कृषिकार्यो को भी आनंदमय तरीके से संपन्न किये जाने की परंपरा थी   बरसात के मौसम में  धान रोपण का प्रमुख कार्य होता है | और भी रबी फसल रोपे जाते हैं लेकिन व्यापक क्षेत्र में धान की फसल ही लगायी जाती है| मुझे याद है आज से तीस पैंतीस वर्ष पूर्व में धान की पहली रोपण के अवसर पर जिसे  बिहार में  पहरोपा कहा जाता है केे अवसर पर विशेष रूप से खाना बनाने और   खिलाने की परंंपरा थी  पता नहीं अब लोग इसे कैसे मनाते हैं  |बरसात के मौसम में एक और प्रचलन बिहार में है चना का दाल भरकर पूड़ी जिसे दलपुडी  कहा  जााता हैऔर खीर पकाकर खाते हैं  इसे अदरिया कहते हैं क्योंकि आद्रा नक्षत्र में  विशेष रूप से इस प्रकार के भोजन बनाने और खिलाने की परंपरा है|  बरसात के मौसम में पकौड़े के साथ चाय का अलग ही मजा है | सावन का महीना भगवान शिव जी का  महीना है हर सा...

फलसफा जिंदगी का

किसी के लिए जिंदगी के मायने क्या हो सकता है यह व्यक्ति🚶 के सोच पर निर्भर करता है  | एक समय रहता है जब  माँ -बाप के लिए  बच्चे पुरी दुनिया होने का अहसास कराते हैं  वहीं बच्चों की पुरी दुनिया भी माँ बाप तक सीमित रहती है | फिर बच्चे👶👶 बडे़ होते हैं  उनका संसार व्यापक होता जाता है  |समय के साथ प्राथमिकता बदलती जाती है |बच्चों के भी अपने 👶👶बच्चें होते हैं |इधर माँ बाप की दुनिया, पुरी तरह से बच्चे और उसके बच्चों तक सिमट सी जाती है | फिर एक समय ऐसा आता है जब जिनकी दुनिया हम होते हैं और जो हमारे लिए पुरी दुनिया बनाते हैं वही हमें छोड़ कर चले जाते हैं अथवा उन्हें जाना पड़ता है   समझ में नहीं आता है कि जिदंगी के मायने क्या ❓ हैं  कहाँ से हमलोग आए हैं और कहाँ जाना है अजीब सी अबूझ पहेली में दिमाग उलझा रहता है  | माँ -बाबुजी का परलोक गमन जीवन का वह "पाठ" पढा गया जिसकी कल्पना मात्र से ही कभी सिहर जाते थे | अब तो इस मायावी दुनिया से ज्यादा इसकी नश्वरता में विश्वास हो चला है | अब नतो कोई बात कडवी लगती है और न ही किसी की बातें आकर्षित करती है | एक ह...

पचास साल के बाद की दिनचर्या

प्रिय दोस्तों👭👬👫 आज मैं  उन लोगो के बारे में कुछ बातें लिखना चाहती हूँ जो लोग अपने जीवन में पचास बसंत देख चुके हैं  . सबसे पहले तो आपलोग खुश 😄😃 हो जाइये कि आपने अर्धशतक पुरा कर लिया  . भारतीय संस्कृति में शतायु पुरा करने की स्थिति को आदर्श जीवन काल माना गया है  जो कि अब कम लोग ही  पुरा कर पाते हैं  . पचास साल पुरा कर लेने के बाद व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य पर ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता होती हैं   अब ये बात समझ लेना चाहिए कि जीवन का अधिकांश समय भागदौड़ में बीत गया  और अब ठहरकर अपने बारे में सोचने की आवश्यकता है. अपने स्वास्थ्य के लिए सोचना चाहिए 1. जहाँ तक संभव हो सके  जल्दी सोने और  सूर्योदय से पहले बिस्तर छोड़ देना चाहिए 2.  योग एवं व्यायाम को अपने दैनिक जीवन में अनिवार्य रूप से शामिल कर लेना चाहिए 3. अपने किसी एक हाॅवी को विकसित कर लेना चाहिए .  4 . हो सके तो अपने आस पास के किसी बाग बगीचे मे थोड़ा समय व्यतीत करने की आदत डाल लेना चाहिए ताकि आप प्रकृति🌿🍃 के सानिध्य में कुछ समय बिता सके.  5. वैसे ...

Health is wealth प्रिय दोस्तों👭👬👫 आज मैं एक ऐसे महामारी या बीमारी के बारे में लिखने जा रहीं हूँ जिस पर पहले ही काफी कुछ लिखा जा चुका है . लेकिन मेरा मन नहीं माना मुझे लगता है कि कोविड 19 या कोरोना वायरस के बारे में जितना भी चर्चा की जाएगी वह समीचीन होगा . इस का कारण है कि अब हमलोगो को कोरोना के साथ जीने की आदत डालने की आवश्यकता है . अगर मानसिक रूप से मज़बूत रहेगें तभी इस को हरा पाएंगे . इस बीमारी से अबतक कितना नुकसान हुआ है उसका आकलन कर पाना मुश्किल है.इस बीमारी के दीर्घकालिक नुकसान अवश्य ही हो ना है जैसा कि अन्य महामारी के समय होता है . फिलहाल इस बीमारी ने विकसित देश और विकासशील देश के बीच का फर्क समाप्त कर दिया है . युरोपीय देश हो या अमेरिका🇺🇸 जैसा विकसित देश सारी स्वास्थ्य सुविधाएं कम पड़ गया और लोग काल के गाल में समाते चले गए और शीर्ष नेतृत्व शोक प्रकट करने के सिवा कुछ भी नहीं कर सका . दो तीन बातें इस महामारी के वक्त स्पष्ट हुआ है जो पूरी दुनिया के आखें खोल देने में सक्षम है पहली ये कि पुरा विश्व🌏 एक अदृश्य शक्ति के समक्ष घुटने टेकने को मजबूर हो गया .दूसरी ये कि माल्थस (अर्थशास्त्री) का सिद्धांत भी सत्य साबित हो रहा है कि प्रकृति स्वयं जनसंख्या नियंत्रण करती है . पृथ्वी पर पर उतनी ही जनसंख्या रहेगा जितना प्रकृति चाहेगी . तीसरी और सबसे अहम बात ये कि मानव जाति को लघुता का अहसास इस बीमारी ने करवा दिया . कोई एक सर्वोच्च सत्ता है जो इस पुरे ब्रह्मांड को संचालित कर रहा है भले ही हम उसे माने या न माने अथवा किसी भी रूप में उपासना करें .

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